घने कोहरे की चादर
शीतल पवन के झोके
ओस की बुंदों से
बसुधा का श्रृंगार
प्रकृति मुसकुराती हुई
मानों बोल रही हो,
क्यों दुबके हो रजाई में
अब तो उठ जाओ
सुबह हो चुकी है...!!!
-©Sachin Kumar ✍️
Picture Credit : Self
मन में उठने वाली भावनाओं के ज्वार का वेग जब प्रबल होता है . इन भावनाओं से उत्पन्न मन की अनुभूतियों कलमबद्ध करने की एक कोशिश ...
मुक होकर भी उन्मुक्त उसका प्रेम है अपलक निहारते ही खुशियों की तरंग स्पंदित कर जाती है, निस्वार्थपुर्ण उसका सारा जीवन इस धरा पर तू ही तो ...
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