बुधवार, 13 दिसंबर 2023

प्रकृति मुसकुराती हुई



 घने कोहरे की चादर

शीतल पवन के झोके

ओस की बुंदों से 

बसुधा का श्रृंगार 

प्रकृति  मुसकुराती हुई

मानों बोल रही हो, 

क्यों दुबके हो रजाई में

अब तो उठ जाओ 

सुबह हो चुकी है...!!! 

-©Sachin Kumar ✍️

 Picture Credit : Self

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

उन्मुक्त उसका प्रेम

 मुक होकर भी उन्मुक्त उसका प्रेम है अपलक निहारते ही  खुशियों की तरंग स्पंदित कर जाती है,  निस्वार्थपुर्ण उसका सारा जीवन इस धरा पर तू ही  तो ...